समास
विनय अपने माता और पिता के साथ देव के मंदिर गया | चार राहों के समूह से गुजरते हुए उसने घोड़े पर सवारी करते हुए छ्त्रपति शिवाजी की मूर्ति देखी | गज के समान आनन वाले देवता के दर्शन किए और चार आनों का समूह एक भिखारी को दिया |
विनय अपने माता - पिता के साथ देवमंदिर गया | चौराहे से गुजरते हुए उसने घुड़सवारी करते हुए छ्त्रपति शिवाजी की मूर्ति देखी | गजानन देवता के दर्शन किए और चव्वनी एक भिखारी को दी |
आपस में संबंध रखने वाले दो या दो से अधिक शब्द जब कोई नया शब्द बनाते हैं तो उस मेल को समास कहते हैं| इसमें विभक्ति प्रत्यय का लोप हो जाता है ; जैसे ‘देवमंदिर’ में ‘देव’ तथा ‘मंदिर’ के बीच परस्पर संबंध बताने वाली विभक्ति ‘का’ लोप हो गया है |
समास में समस्तपद तथा समास विग्रह का उल्लेख होता है |
समस्तपद
समास में जब दो या दो से अधिक शब्दों से मिलकर नया शब्द बनता है उसे समस्तपद कहते है |
जैसे घौड़े की सवारी को एक शब्द में घुड़सवारी लिखते है तो घुड़सवारी समस्तपद है |
समास विग्रह
समस्तपद को अलग करके लिखना समास विग्रह कहलाता है|
जैसे यथाशक्ति में समास का विग्रह करते है तो शक्ति के अनुसार इसका समास विग्रह होगा |
समास के निम्नलिखित छः भेद हैं –
1. अव्ययीभाव समास
2. तत्पुरुष समास
3. द्वंद्व समास
4. बहुब्रीहि समास
5. द्विगु समास
6. कर्मधारय समास
इनका उल्लेख निम्नप्रकार से है |
अव्ययीभाव समास
जिस समास में पहला पद प्रधान हो और समस्त पद अव्यय (क्रिया , विशेषण ) का काम करे, उसे अव्ययी भाव समास कहते हैं| यदि एक शब्द की पुनरावृति हो और दोनों शब्द मिलकर अव्यय की तरह प्रयुक्त हो, वहाँ भी अव्ययीभाव समास होता है | जैसे –यथाशक्ति, भरपेट, प्रति दिन, बीचों-बीच –
यथाशक्ति:- शक्ति के अनुसार निडर :- बिना डर के
यथासंभव :- जैसा संभव हो घर-घर :- हर घर
यथामति:- मति के अनुसार अनजाने :- जाने बिना
यथविधि :- विधि के अनुसार बीचों-बीच :- ठीक बीच में
प्रतिदिन :- दिन- दिन रातों-रात :- रात ही रात में
प्रत्येक :- एक-एक हाथों-हाथ :- हाथ ही हाथ में
मनमन :- मन ही मन हररोज़ :- रोज़-रोज़
तत्पुरुष समास
तत्पुरुष समास का दूसरा पद प्रधान होता है अर्थात विभक्ति का लिंग, वचन दूसरे पद के अनुसार होता है |और दोनों पदों के बीच प्रथम (कर्ता) तथा अंतिम (सम्बोधन) कारक के अतिरिक्त शेष किसी भी कारक की विभक्ति का लोप पाया जाता है तथा विभक्तियों के अनुसार ही इसके उपभेद होते हैं | इस समास के विभिन्न प्रकार उदाहरण सहित निम्नलिखित है |
(क) कर्म तत्पुरुष समास (को)
प्राप्तोदक :- उदक को प्राप्त जेबकतरा :- जेब को कतरने वाला
वन गमन :- वन को गमन सुखद :- नेत्रों को सुखद
(ख) करण तत्पुरुष समास (से /के द्वारा )
ऋण-मुक्त :- ऋण से मुक्त हस्तलिखित :-हस्त से लिखित
तुलसीकृत:- तुलसी से कृत मुँह-मांगा:- मुँह से मांगा हुआ
(ग) संप्रदान तत्पुरुष समास ( के लिए )
रण-निमंत्रण :- रण के लिए निमंत्रण आरामकुर्सी :- आराम के लिए कुर्सी
राह-खर्च :- राह के लिए खर्च देश-भक्ति :- देश के लिए भक्ति
(घ) अपादान तत्पुरुष समास (से पृथक )
पथ-भ्रष्ट :- पथ से भ्रष्ट ऋण – मुक्त”- ऋण से मुक्त
देश निकाला :- देश से निकाला धर्म -विमुख :- धर्म से विमुख
(ङ) संबंध तत्पुरुष (का, के, की )
प्रेम-सागर :- प्रेम का सागर राजमाता :- राजा की माता
मृगाशावक :- मृग का शावक राज-पुरुष :- राजा का पुरुष
वज्रपात :- वज्र का पात लखपति :- लाखों का पति
(च) अधिकरण तत्पुरुष समास (में, पर, पे)
देशाटन :- देशों में अटन घुड़सवार :- घोड़े पर सवार
जीवदया :- जीवों पर दया ध्यान-मग्न :- ध्यान में मग्न
वनवास :- वन में वास मनगढ़ंत :- मन से गढ़ी हुई
राजरानी:- राजा की रानी ठाकुरसुहाती :- ठाकुर की सुहाती
द्वंद्व समास
(क) द्वंद्व समास में दोनों पद प्रधान होते है |
(ख) दोनों पद प्राय: एक-दूसरे के विलोम होते है |
(ग) इसका विग्रह करने पर ‘और’ अथवा ‘या’ का प्रयोग किया जाता है |
जैसे
दाल-रोटी = दाल और रोटी पाप-पुण्य = पाप और पुण्य / पाप या पुण्य
अन्न-जल = अन्न और जल जलवायु = जल और वायु
भला-बुरा = भला या बुरा रुपया-पैसा = रुपया या पैसा
यशापयश = यश या अपयश धर्म- अधर्म = धर्म या अधर्म
अपना-पराया = अपना या पराया सुरासुर = सुर या असुर
बहुब्रीहि समास
(क) बहुब्रीहि समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता |
(ख) इसमें प्रयुक्त सामान्य अर्थ की अपेक्षा अन्य अर्थ की प्रधानता रहती है |
(ग) इसका विग्रह करने पर ‘वाला है, जो, जिसका, जिसकी, जिसके, वह आदि आते हैं |
जैसे
गजानन :- गज का आनन है जिसका (गणेश) त्रिनेत्र :- तीन नेत्र है जिसके (शिव)
चतुर्भुज :- चार भुजाएँ है जिसकी (विष्णु) दशानन :- दश आनन हैं जिसके (रावण)
पीताम्बर :- पीत अम्बर हैं जिसके (विष्णु) जलज :- जल में जन्म लेने वाला (कमल)
नीलकंठ :- नीला कंठ है जिसका (शिव) कमलनयन :- कमल के समान नयन वाला
चन्द्रमुखी :- चंद्रमा के समान मुख वाली घनश्याम :- घन जैसा श्याम है जो (कृष्ण)
द्विगु समास
i)द्विगु समास में प्राय: पूर्वपद संख्यावाची होता है तो कभी-कभी परपद भी संख्यावाची देखा जा सकता है |
ii)द्विगु समास में प्रयुक्त संख्या किसी समूह का बोध करती है अन्य अर्थ का नहीं, जैसे की बहुब्रीहि समास में देखा जा सकता है |
iii) इसका विग्रह करने पर समूह ‘या’ समाहार शब्द प्रयुक्त होता है |
दोराहा :- दो राहों का समूह त्रिभुज ;- तीन भुजाओं का समूह
त्रिलोक ;- तीन लोकों का समूह चौराहा ;- चार राहों का समूह
चतुर्भुज ;- चार भुजाओं का समाहार पंचामृत ;- पाँच अमृतों का समाहार
षड्भुज ;- छ्ह भुजाओं का समूह सप्तऋषि ;- सात ऋषियों का समूह
चौमासा ;- चार मासों का समाहार अष्टसिद्धि;- आठ सिद्धियों का समूह
नवरत्न ;- नौ रत्नों का समूह नवरात्र;- नौ रात्रियों का समाहार
दशक ;- दस का समूह शतक ;- सौ का समाहार
कर्मधारय समास
जिस समास में दूसरा पद प्रधान हो तथा पहले और दूसरे पद के बीच विशेषण-विशेष्य अथवा उपमेय-उपमान का संबंध हो, तो उसे कर्मधारय समास कहते है | जैसे
नीलांबर नीला है जो अंबर
भलामानस भला है जो मानस
नीलगगन नीला है जो गगन
चरणकमल कमल जैसे चरण
चंद्रमुख मुख रूपी चंद्र
मृगनयन मृग के समान नयन
इनके बीच के बीच विशेषण-विशेष्य अथवा उपमेय-उपमान का संबंध को निम्नप्रकार से समझ सकते है |
समस्तपद विशेषण विशेष्य विग्रह
भलामानस भला मानस भला है जो मानस
नीलगगन नीला गगन नीला है जो गगन
समस्तपद उपमेय उपमान विग्रह
चरणकमल चरण कमल कमल जैसे चरण
चंद्रमुख मुख चंद्र मुख रूपी चंद्र
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