पाठ 4
कठपुतली
(भवानी प्रसाद मिश्र)
1) कठपुतली
गुस्से से उबली बोली –ये धागे
क्यों हैं मेरे पीछे-आगे?
इन्हें तोड़ दो;
मुझे मेरे पाँवों पर छोड़ दो|
शब्दार्थ - कठपुतली : डोरे से बांधकर नचाई जाने वाली
काठ की पुतली ; गुस्से से उबलना : अत्यधिक
क्रोध में होना ; पाँवों पर छोड़ना : मुक्त करना |
प्रसंग -प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ ‘
बसंत भाग -2 ‘ में संकलित कठपुतली कविता से ली गई है | इसके
रचयिता श्री भवानी प्रसाद मिश्र है |
सरलार्थ – कवि
कहता है कि कठपुतलियाँ लम्बे समय से पराधीन होकर जी रही है |
उनके मन में स्वतन्त्रता की अभिलाषा जाग उठी है | अपनी
पराधीनता को देखकर एक कठपुतली गुस्से से भर उठती है | गुस्से
में ही बोल उठती है कि हमारे पीछे इतने धागे क्यों है ?
उन्हें बंधन में क्यों रखा गया है ? वह बंधनमुक्त होना चाहती
है और स्वतंत्र होकर अपने पैरों पर खड़ा
होना चाहती है |उनके स्वर में विद्रोह का भाव है |
विशेष- कविता
प्रश्न शैली में है|
पुतलियों का मानवीकरण किया गया है |
स्वतन्त्रता सबको प्रिय है ,
यह भाव व्यक्त हुआ है |
2 ) सुनकर बोलीं और –और
कठपुतलियाँ
कि हाँ
बहुत दिन हुए
हमें अपने मन के छंद छुए
मगर.......
पहली कठपुतली सोचने लगी –
ये कैसी इच्छा
मेरे मन में जगी?
शब्दार्थ – मन के
छंद छुए –मन में खुशी आना
प्रसंग – पूर्ववत
इन पंक्तियों में
कवि ने कठपुतलियों के मन भावों को व्यक्त किया है |
सरलार्थ
– एक
कठपुतली को दुख से बाहर निकलने के लिए विद्रोह करता देखकर अन्य कठपुतलियों ने भी उसकी
हाँ में हाँ मिलाई | वे कहने लगीं कि हमें बंधन में रहते हुए बहुत दिन बीत गए, न हमारे मन का दुख दूर हुआ और न मन मे खुशी आई जिससे हम खुश होकर रहे |
स्वतन्त्रता सबको अच्छी लगती है |
लेकिन जब पहली कठपुतली पर सबकी जिम्मेवारी आई तो वह स्वयम् से प्रश्न करने लगती है
कि उसके मन में ये कैसी इच्छा जाग उठी ? इस विषय में बिना सोचे-समझे कदम उठाना उचित
नहीं है |
विशेष - पराधीनता में खुश नहीं रहा जा सकता है ,
यह भाव प्रकट हो रहा है |
प्रश्न )
कठपुतली को क्यों गुस्सा आया ?
उत्तर ) कठपुतली के आगे पीछे धागे ही धागे
थे ,अर्थात वह कुछ भी करने को स्वतंत्र नहीं थी | वह
पराधीन रहकर जीवन बिता रही थी | ऐसा जीवन उसे लंबे समय तक
जीना पड़ रहा था | अपनी स्वतन्त्रता की चेतना जागृत होने पर
कठपुतली को गुस्सा आया |
प्रश्न ) कठपुतली को अपने पाँवों पर खड़ी
होने की इच्छा है ,लेकिन वह क्यों नहीं खड़ी होती ?
उत्तर ) कठपुतली को अपने पाँवों पर खड़ी
होने की इच्छा है ,लेकिन वह नहीं खड़ी हो पाती है क्योंकि उस पर बाकी कठपुतलियों की भी
जिम्मेदारी आती है |
अकेले उसी के स्वतंत्र होने से कोई बात नहीं बनने वाली है |
जरूरत है सभी कठपुतलियों के स्वतंत्र होने की |
प्रश्न ) पहली कठपुतली की बात दूसरी
कठपुतली को क्यों अच्छी लगी ?
उत्तर ) पहली कठपुतली की बात दूसरी
कठपुतली को इसलिए अच्छी लगी क्योंकि वे भी इस बंधनयुक्त जीवन से मुक्त होना चाहती थी |
आखिर स्वतंत्रता सबको अच्छी लगती है |
प्रश्न ) ‘ बहुत दिन हुए /
हमें अपने मन के छंद छुए |’ इस पंक्ति का अर्थ और क्या हो
सकता है ?-
उत्तर )
बहुत दिन हो गए मन का दुख दूर नहीं हुआ और न मन में खुशी आई |
प्रश्न ) नीचे दो-दो स्वतन्त्रता आंदोलन
के वर्ष दिये गए है | इन दोनों आंदोलनों के दो-दो स्वतन्त्रता सेनानियों के नाम लिखिए |
क)
सन् 1857....
सन्
1942 ......
उत्तर )
सन् 1857- मंगल पांडे .रानी
लक्ष्मीबाई
सन् 1942 - महात्मा गांधी ,सरदार वल्लभ भाई
पटेल |
भाषा की बात
प्रश्न ) जब काठ और पुतली दो शब्द
एक साथ हुए कठपुतली शब्द बन गया और बोलने में सरलता आ गई |
इस प्रकार के कुछ और शब्द बनाइए |
उत्तर )
काठ (कठ) से बना - कठगुलाब , कठफोड़ा
हाथ (हथ ) से बने शब्द - हथकंडा , हथकड़ी, हथगोला, हथकरघा ,
सोना ( सोन) से बने शब्द - सोन जुही , सोन हला , सोन केला |
मिट्टी (मठ ) से बने शब्द - मठाधीश , मठधारी, मठपति |