Saturday, April 22, 2023

समास

 

समास

विनय अपने माता और पिता के साथ देव के मंदिर गया | चार राहों के समूह से गुजरते  हुए  उसने घोड़े पर सवारी करते हुए छ्त्रपति शिवाजी की मूर्ति देखी | गज के समान आनन वाले देवता के दर्शन किए और चार आनों का समूह एक भिखारी को दिया |

विनय अपने माता - पिता के साथ देवमंदिर गया | चौराहे से गुजरते  हुए  उसने घुड़सवारी करते हुए छ्त्रपति शिवाजी की मूर्ति देखी | गजानन  देवता के दर्शन किए  और चव्वनी एक भिखारी को दी  |

आपस में संबंध रखने वाले दो या दो से अधिक शब्द जब कोई नया शब्द बनाते हैं तो उस मेल को समास कहते हैं| इसमें विभक्ति प्रत्यय का लोप हो जाता है ; जैसे देवमंदिर में देव तथा मंदिर के बीच परस्पर संबंध बताने वाली विभक्ति का लोप हो गया है |

समास में समस्तपद तथा समास विग्रह का उल्लेख  होता है |

समस्तपद

समास में जब दो या दो से अधिक शब्दों से मिलकर नया शब्द बनता है उसे समस्तपद कहते है |

जैसे घौड़े की सवारी  को एक शब्द में घुड़सवारी लिखते है तो घुड़सवारी समस्तपद है |

समास विग्रह  

समस्तपद को अलग करके लिखना  समास विग्रह कहलाता है|

 जैसे यथाशक्ति में समास का विग्रह करते है तो शक्ति के अनुसार  इसका समास विग्रह होगा |

समास के निम्नलिखित छः भेद हैं –

1.      अव्ययीभाव समास

2.      तत्पुरुष समास

3.      द्वंद्व समास

4.      बहुब्रीहि समास

5.      द्विगु समास

6.      कर्मधारय समास

इनका उल्लेख निम्नप्रकार से है |

 

अव्ययीभाव समास

जिस समास में पहला पद प्रधान हो और समस्त पद अव्यय (क्रिया , विशेषण ) का काम करे, उसे अव्ययी भाव समास कहते हैं| यदि एक शब्द  की पुनरावृति हो और दोनों शब्द मिलकर अव्यय की तरह प्रयुक्त हो, वहाँ भी अव्ययीभाव समास होता है | जैसे –यथाशक्ति, भरपेट, प्रति दिन, बीचों-बीच –

यथाशक्ति:-         शक्ति के अनुसार              निडर :-             बिना डर के

यथासंभव :-        जैसा संभव हो                  घर-घर :-            हर घर

यथामति:-          मति के अनुसार              अनजाने :-          जाने बिना  

यथविधि :-         विधि के अनुसार              बीचों-बीच :-      ठीक बीच में

प्रतिदिन :-          दिन- दिन                        रातों-रात :-         रात ही रात में

प्रत्येक :-            एक-एक                         हाथों-हाथ :-       हाथ ही हाथ में

मनमन :-            मन ही मन                       हररोज़ :-             रोज़-रोज़

तत्पुरुष समास

तत्पुरुष  समास का दूसरा पद प्रधान होता है अर्थात विभक्ति का लिंग, वचन दूसरे पद के अनुसार होता है |और दोनों पदों के बीच प्रथम (कर्ता) तथा अंतिम (सम्बोधन) कारक के अतिरिक्त शेष किसी भी कारक की विभक्ति का लोप पाया जाता है तथा विभक्तियों के अनुसार ही इसके उपभेद होते हैं  | इस समास के विभिन्न प्रकार उदाहरण सहित  निम्नलिखित है |

(क)  कर्म तत्पुरुष समास (को)

प्राप्तोदक :-          उदक को प्राप्त                  जेबकतरा :-        जेब को कतरने वाला

वन गमन :-         वन को गमन                   सुखद :-             नेत्रों को सुखद

 

(ख)  करण तत्पुरुष समास (से /के द्वारा )

ऋण-मुक्त :- ऋण से मुक्त                                                          हस्तलिखित :-हस्त से लिखित

तुलसीकृत:- तुलसी से कृत                                                        मुँह-मांगा:-   मुँह से मांगा हुआ

(ग)   संप्रदान तत्पुरुष समास ( के लिए )

              रण-निमंत्रण :-    रण के लिए निमंत्रण                                      आरामकुर्सी  :- आराम के लिए कुर्सी

     राह-खर्च :-    राह के लिए खर्च                                           देश-भक्ति :-  देश के लिए भक्ति

(घ)   अपादान तत्पुरुष समास (से पृथक )

 पथ-भ्रष्ट :-         पथ से भ्रष्ट                       ऋण – मुक्त”-      ऋण से मुक्त

देश निकाला :-    देश से निकाला                धर्म -विमुख :-     धर्म से विमुख

(ङ)  संबंध तत्पुरुष (का, के, की )

              प्रेम-सागर :-      प्रेम का सागर                  राजमाता :-         राजा की माता

            मृगाशावक :-      मृग का शावक                 राज-पुरुष :-         राजा का पुरुष

            वज्रपात :-          वज्र का पात                    लखपति :-          लाखों का पति

(च)  अधिकरण तत्पुरुष समास (में, पर, पे)

            देशाटन :-           देशों में  अटन                  घुड़सवार :-         घोड़े पर सवार

            जीवदया :-          जीवों पर दया                   ध्यान-मग्न :-       ध्यान में मग्न

            वनवास :-           वन में वास                      मनगढ़ंत :-          मन से गढ़ी हुई

            राजरानी:-           राजा की  रानी                 ठाकुरसुहाती :-    ठाकुर की सुहाती               

द्वंद्व समास

(क) द्वंद्व समास में दोनों पद प्रधान होते है |

(ख) दोनों पद प्राय: एक-दूसरे के विलोम होते है |

(ग)   इसका विग्रह करने पर और अथवा या का प्रयोग किया जाता है |

जैसे

दाल-रोटी     = दाल और रोटी                                         पाप-पुण्य  = पाप और पुण्य / पाप या पुण्य  

अन्न-जल     = अन्न और जल                                        जलवायु   = जल और वायु

भला-बुरा     = भला या  बुरा                                           रुपया-पैसा = रुपया या पैसा

यशापयश     = यश या अपयश                                        धर्म- अधर्म = धर्म या अधर्म

अपना-पराया  = अपना या पराया                                     सुरासुर        = सुर या असुर

बहुब्रीहि समास

(क) बहुब्रीहि समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता |

(ख) इसमें प्रयुक्त सामान्य अर्थ की अपेक्षा अन्य अर्थ की प्रधानता रहती है |

(ग)   इसका विग्रह करने पर वाला है, जो, जिसका, जिसकी, जिसके, वह आदि आते हैं |

जैसे

गजानन :-           गज का आनन है जिसका  (गणेश)               त्रिनेत्र :-             तीन नेत्र है जिसके (शिव)

चतुर्भुज :-           चार भुजाएँ है जिसकी (विष्णु)                     दशानन :-           दश आनन हैं जिसके (रावण)

पीताम्बर :-         पीत अम्बर हैं  जिसके (विष्णु)                     जलज :-             जल में जन्म लेने वाला (कमल)

नीलकंठ :-          नीला कंठ है जिसका  (शिव)                       कमलनयन :-      कमल के समान नयन वाला

चन्द्रमुखी :-        चंद्रमा के समान मुख वाली                         घनश्याम :-         घन जैसा श्याम है जो (कृष्ण)

द्विगु समास

i)द्विगु समास में प्राय: पूर्वपद संख्यावाची होता है तो कभी-कभी परपद भी संख्यावाची देखा जा सकता है |

ii)द्विगु समास में प्रयुक्त संख्या किसी समूह का बोध करती है अन्य अर्थ का नहीं, जैसे की बहुब्रीहि समास में देखा जा सकता है |

iii) इसका विग्रह करने पर समूह या समाहार  शब्द प्रयुक्त होता है |

दोराहा  :-           दो राहों का समूह                          त्रिभुज ;-            तीन भुजाओं का समूह

त्रिलोक ;-           तीन लोकों का समूह                     चौराहा ;-                       चार राहों का समूह

चतुर्भुज ;-           चार भुजाओं का समाहार               पंचामृत ;-                      पाँच अमृतों का समाहार

षड्भुज ;-           छ्ह भुजाओं का समूह                   सप्तऋषि ;-                     सात ऋषियों का समूह

चौमासा ;-          चार मासों का समाहार                   अष्टसिद्धि;-                     आठ सिद्धियों का समूह

नवरत्न ;-            नौ रत्नों का समूह              नवरात्र;-                         नौ रात्रियों का समाहार

दशक ;-             दस का समूह                               शतक ;-                         सौ का समाहार

कर्मधारय समास

जिस समास में दूसरा पद प्रधान हो तथा पहले और दूसरे पद के बीच विशेषण-विशेष्य अथवा उपमेय-उपमान का संबंध हो, तो उसे कर्मधारय समास कहते है | जैसे

नीलांबर                   नीला है जो अंबर

भलामानस                भला है जो मानस

नीलगगन                  नीला है जो गगन

चरणकमल               कमल जैसे चरण

चंद्रमुख                    मुख रूपी चंद्र 

मृगनयन                   मृग के समान नयन

इनके बीच के बीच विशेषण-विशेष्य अथवा उपमेय-उपमान का संबंध को निम्नप्रकार से समझ सकते है |

समस्तपद                 विशेषण         विशेष्य          विग्रह

भलामानस                भला             मानस            भला है जो मानस

नीलगगन                  नीला             गगन             नीला है जो गगन

समस्तपद                 उपमेय            उपमान                    विग्रह

चरणकमल               चरण             कमल            कमल जैसे चरण

चंद्रमुख                    मुख              चंद्र               मुख रूपी चंद्र 

 

सवैये रसखान

 

सवैये

रसखान

क्षितिज भाग-1 खंड

 

प्रश्न 1) ब्रजभूमि के प्रति कवि का प्रेम किन –किन रूपों में अभिव्यक्त हुआ है ?

उत्तर ) ब्रजभूमि से कवि का बहुत लगाव था | वह अपने हर जन्म में इसका हिस्सा बनना चाहता है | यदि उसे मानव रूप मिलें तो ब्रज गाँव में ग्वालों के बीच में रहना चाहेगा | पशु की योनि प्राप्त होने पर नन्द बाबा की गौवों के साथ चरने वाली गाय बनना चाहेगा | यदि पत्थर का रूप मिले तो उसी गोवर्धन पहाड़ का भाग बनना चाहेगा जिसे इन्द्र के गुस्से से बचने के लिए श्री कृष्ण ने अपनी उंगली पर उठा लिया था | पक्षी रूप में जन्म मिलने पर यमुना किनारे बसे कदंब की डालियों पर ही रहना चाहेगा |

प्रश्न 2) कवि का ब्रज के वन, बाग और तालाब को निहारने के पीछे क्या कारण है ?

उत्तर ) कवि का श्री कृष्ण की प्रिय भूमि  और लीला स्थली ब्रज से अत्यधिक लगाव था | वे इसी कारण ब्रज क्षेत्र के पत्ते-पत्ते, धूल के प्रत्येक कण में उनके दर्शन कर अपने आपको सौभाग्यशाली समझते थे | भक्त को अपने आरध्य देव की हर वस्तु अच्छी लगती है | यह उसकी भक्ति की पराकाष्ठा है | कवि रसखान जी ब्रज के वन, बाग और तालाब को निहारते थे |

प्रश्न 3) एक लकुटिया और कामरिया पर कवि सब कुछ न्योछावर करने को क्यों तैयार है ?

उत्तर ) कवि रसखान जी का श्री कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम था | वे उनकी हर वस्तु से प्रेम करते थे | जब श्री कृष्ण जी गाय चराने के लिए जाते थे तो उस समय केवल एक लाठी और काला कंबल रखते थे | इसलिए कवि उस लाठी व कंबल पर तीनों लोकों का सारा राज, धन और सभी प्रकार की निधियाँ लौटाने के लिए तैयार हो जाता  है |

प्रश्न 4) सखी ने गोपी से श्री कृष्ण का कैसा रूप धारण करने का आग्रह किया है ? अपने शब्दों में वर्णन करो |

उत्तर ) सखी ने गोपी से श्री कृष्ण के समान वेशभूषा पहनने और उनके जैसा रूप धारण करने के लिए कहा है | सिर पर मोर पंख, गले में गूंज की माला ,शरीर पर पीले वस्त्र पहनने और फिर उनकी तरह लाठी लेकर ग्वाल बालों के साथ घूमने के लिए आग्रह किया है | ऐसा करके वो श्री कृष्ण की यादों को ताज़ा करना चाहती है |

प्रश्न 5) आपके विचार  से कवि पशु, पक्षी और पहाड़ के रूप में भी कृष्ण का सान्निध्य क्यों प्राप्त करना चाहता है ?

उत्तर ) भक्त की यही हार्दिक इच्छा होती है कि वह अपने इष्ट देव के पास रहे | उसे हर समय उसकी अनुभूति होती रहे | वह उससे व उसकी हर वस्तु से  अपार स्नेह करता है | वह मोक्ष की इच्छा नहीं करता बल्कि उसकी भक्ति चाहता है यह भक्ति का उच्चतम स्तर होता है | अत : हमारे विचार  से कवि पशु, पक्षी और पहाड़ के रूप में भी कृष्ण के निकट  रहना चाहता है |

प्रश्न 6) चौथे सवैये के अनुसार गोपियाँ अपने आप को क्यों विवश पाती हैं ?

उत्तर )   जब श्री कृष्ण जी मुरली बजाते है तो उसकी तान सुनकर गोपियाँ अपने बच्चे को दूध पिलाना छोड़ देती हैं | मुरली की  धुन सुनकर गोपियाँ अपने कानों को अपनी उँगलियों से बंद कर लेती हैं तो कभी छत पर चढ़ जाती है | इसकी मधुर स्वर के सामने वे अपने आप को विवश पाती है | लेकिन उनकी मादक मुस्कान के आगे तो वो नतमस्तक हो जाती है और श्री कृष्ण की ही होकर रह जाती है |

प्रश्न 7 (क) “कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं”  पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए-|

 उत्तर ) रसखान जी  ब्रज क्षेत्र के काँटों भरी झड़ियों के कुंजों को सुंदर सोने महलों से उत्तम मानता है | और उनको पाने के लिए करोड़ों सुंदर सोने के महलों को न्यौछावर करने के लिए तैयार है |

प्रश्न 7 (ख) “माइ री वा सुख की मुसकानि सम्हारी न जैहै, न जैहै, न जैहै |”  पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए-|

उत्तर ) गोपियाँ श्री कृष्ण की मंद-मंद प्यारी सी मुस्कान पर मोहित हो जाती है और उनका स्वयं पर कोई नियंत्रण नहीं होता | अर्थात श्री कृष्ण पर मुग्ध हो जाती है |

प्रश्न 8) कालिंदी कूल कदंब की डारन में कौन सा अलंकार है ?

उत्तर ) अनुप्रास अलंकार

प्रश्न 9) “या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी |”  पंक्ति का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए |

उत्तर ) गोपियाँ का मुरली के प्रति सौत का भाव है | इसलिए श्री कृष्ण की प्रिय वस्तु होते हुए भी वह उसे अपने होठों पर नहीं लगाना चाहती है | काव्यांश रचना सवैया छंद में है | ब्रज भाषा की मधुरता निहित है | ’,   तथा वर्णों की आवृति  के कारण अनुप्रास अलंकार है | काव्यांश में माधुर्य गुण व्याप्त है | गोपियाँ का हठ भाव दिखाया गया है |

अन्य प्रश्न

प्रश्न ) कवि मनुष्य के रूप में कहाँ कहाँ जन्म लेना चाहता है और क्यों ?

उत्तर ) कवि श्री कृष्ण के परम भक्त है | यदि उनका पुनर्जन्म हो तो वे मनुष्य के रूप में जीवन पाकर ब्रज क्षेत्र के गोकुल में घूमना चाहता है | और ग्वाल-बालों के संग गाय वन-वन जाकर चराना चाहता है |

प्रश्न ) गोपी कैसा शृंगार करना चाहती है ?

उत्तर ) गोपी श्री कृष्ण के प्रति आसक्त है | वह उनकी तरह रूप धारण कर शृंगार  करना चाहती है | वह उनके मोरपंख का मुकुट धारण करना चाहती है | गले में कुंजों की माला पहनना चाहती है | पीताम्बर वस्त्र धारण करना चाहती है | उनकी तरह हाथों में लाठी लेकर वन-वन फिरने  को तैयार  है |

प्रश्न ) गोपी अपने होठों पर मुरली क्यों नहीं रखना चाहती ?

उत्तर ) गोपी से यह कदापि सहन नहीं होता कि श्री कृष्ण मुरली को अपने होठों से सदा लगाए रखे | वह मुरली से उनकी सौत के समान ईर्ष्या करती है | और अपना शत्रु मानती है | अत : मुरली को होठों से नहीं लगाती है |

प्रश्न ) “ कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं |”  पंक्ति का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए |

उत्तर ) कवि रसखान ने श्री कृष्ण और ब्रज क्षेत्र के प्रति अपने मन के प्रेम भाव को व्यक्त किया | वह ब्रज की काँटेदार झड़ियों के कुंजों के ऊपर करोड़ों महल न्यौछावर करने के लिए तैयार है | उन्हें केवल ब्रज क्षेत्र में किसी भी रूप में स्थान चाहिए | शांत रस का उत्तम प्रयोग किया गया है | प्रसाद व अभिधा शब्द शक्ति है | सवैया छंद का प्रयोग किया गया है |

समास

  समास विनय अपने माता और पिता के साथ देव के मंदिर गया | चार राहों के समूह से गुजरते   हुए   उसने घोड़े पर सवारी करते हुए छ्त्रपति शि...