रहीम के दोहे
कहि रहीम संपति सगे ,बनत बहुत बहु रीत |
विपत्ति कसौटी जे कसे ,तेई तेई साँचे मीत ||
शब्दार्थ
- संपति: धन-दौलत , बहु: अनेक रीत:विधि
विपत्ति:
संकट कसौटी: जांच जे:
जो
तेई:
वे ही साँचे: वास्तविक मीत: मित्र
प्रसंग –प्रस्तुत दोहा वसंत भाग दो में संकलित” रहीम के दोहे “
नामक पाठ से लिया गया है | इसके रचयिता कवि रहीम है |
सरलार्थ
-कवि कहता है कि किसी भी मनुष्य के पास जब धन –संपत्ति रहती
है , तब बहुत लोग अनेक प्रकार से उसके अपने बनने की कोशिश करते हैं | कि मैं तो तुम्हारे उस रिशतेदार का रिशते दार हूँ |
अरे तुम तो मेरे मित्र रहे हो, आदि –आदि | सच्चे मित्र तो वो होते
हैं , जो मुसीबत के
समय साथ नहीं छोड़ते हैं ओर वे मुसीबत के समय जांच में खरे उतरते
हैं |
जाल परे जल जात बहि ,तजि मीनन को मोह |
रहिमन मछरी नीर को ,तऊ छाड़ति छोह ||2||
शब्दार्थ - परे: पड़ने पर, जात बहि: बह जाता है, तजि:छोडकर, मीनन: मछलियाँ
मोह: प्रेम , नीर: पानी, तऊ: तब भी , छोह:लगाव
प्रसंग –पूर्ववत |
इन पंक्तियों में कवि ने मछलियों के नीर –प्रेम का वर्णन
किया है |
सरलार्थ –कवि रहीम कहते है कि सागर ,नदी या तालाब में मछलियां पकड़ने के लिए जब जाल डाला जाता है ,तो जाल में से पानी बह जाता है अर्थात वह बंधक बनकर मछलियों का साथ देने
को तैयार नहीं होता है |उसे मछलियों से कोई मोह नहीं रह जाता
है |ऐसी स्थिति मे भी मछलियो पानी से अपना मोह या प्रेम नहीं
छोड पाती हैं और वे पानी के अभाव में अपने प्राण त्याग देती है |
तरुवर फल नहिं खात
है,सरवर पियत न पान|
-कहि रहीम परकाज हित
,संपित –सचहिं सुजान ||3||
शब्दार्थ - तरुवर: पेड़ , खात: खाना, सरवर: सरोवर,
पियत : पीना, पान :पानी
परकाज: दूसरों का काम, हित: भलाई, सचहिं: इकट्ठा करना, सुजान: अच्छे लोग
प्रसंग - पूर्ववत |
इन
पंक्तियों मे कवि ने प्रकृति के परोपकारी स्वभाव का वर्णन किया है |
सरलार्थ – कवि रहीम कहते हैं कि प्रकृति सदा से ही परोपकारी स्वभाव की रही है | प्रकृति के अंग पेड़
अपने फल स्वय नहीं खाते हैं ,और तालाब कभी भी अपना
पानी स्वयं नहीं पीते हैं | तालाब अपना पानी दूसरों के लिए धारण करते हैं |इसी प्रकार सज्जन भी अपनी संपत्ति का संचय दूसरों के लिए ही करते हैं
अर्थात अपने धन को दूसरों की भलाई में लगा देते हैं |
थोथे बादर क्वार के ,
ज्यों रहीम घहरात |
धनी
पुरुष निर्धन भए, करें पाछिली बात||
शब्दार्थ
– थोथे बादर:जलविहीन बादल,
क्वार: आश्विनी माह,
घहरात: बादलों का गर्जना, निर्धन: गरीब, पाछिली
: पिछली
प्रसंग
– पूर्ववत|
सरलार्थ
– इन पंक्तियों में समय बदल जाने पर भी कुछ लोगों द्वारा गर्वीली
बातें करने की आदत छोड़ पाने का वर्णन किया है|
कवि कहते है कि अपने पुराने समय
में धनी लोग सम्पन्न रहते हुए जिन बातों के आदि हो जाते है वे धन वैभव चला जाने पर
भी उ आदतों को नहीं छोड़ते और अपने पुराने दिनों की बड़बोलेपन की बातें ठीक उसी प्रकार करते है जैसे क्वार माह
के जलहीन बादल गरजते है|अर्थात वर्षा ऋतु (आषाढ़ , सावन,भादों) के बादल जलयुक्त होते
हैं और जब गरजते है तो वर्षा की संभावना बनी रहती हैपरंतु क्वार माह के बादल गरजते
तो है पर बरसते नहीं है|
धरती सी की रीत है,सीत घाम और मेह|
जैसी परे सो सही रहे,
त्यों रहीम यह देह ||
शब्दार्थ – सी: तरह रीत : तरीका,ढंग सीत: सर्दी घाम:
धूप मेह: बादल
परे: पड़
जाएँ सहि: सहन करना
त्यों: उसी प्रकार देह: शरीर
इन पंक्तियों में कवि ने धरती और मनुष्य के शरीर की सहनशीलता की तुलना की
है|
सरलार्थ – मनुष्य का शरीर भी परिस्थितियों के अनुसार खुद को समायोजित कर
लेता है| इस संबंध में कवि रहीम कहते हैं कि शरीर को
सर्दी ,गर्मी,वर्षा अर्थात विषम
परिस्थितियों में कठिनाइयों को उसी प्रकार सहना पड़ता है,जैसे
धरती सर्दी,गर्मी और वर्षा की अनेक कठिनाइयों को सहन करती है
, अर्थात सर्दी, गर्मी और वर्षा सहना
उसकी परंपरा बन गई है |
विशेष- धरती की सी रीत में उपमा
अलंकार है |
दोहा छंद का प्रयोग हुआ है|