Monday, July 5, 2021

पाठ 4 कठपुतली

 

पाठ 4

कठपुतली

            (भवानी प्रसाद मिश्र)

1)                          कठपुतली

             गुस्से से उबली बोली –ये धागे

            क्यों हैं मेरे पीछे-आगे?

            इन्हें तोड़ दो;

           मुझे मेरे पाँवों पर छोड़ दो|

शब्दार्थ -   कठपुतली : डोरे से बांधकर नचाई जाने वाली काठ की पुतली ;  गुस्से से उबलना : अत्यधिक क्रोध में होना ; पाँवों पर छोड़ना : मुक्त करना |

 प्रसंग -प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ बसंत भाग -2 में संकलित कठपुतली  कविता से ली गई है | इसके रचयिता श्री भवानी प्रसाद मिश्र है |

सरलार्थ – कवि कहता है कि कठपुतलियाँ लम्बे समय से पराधीन होकर जी रही है | उनके मन में स्वतन्त्रता की अभिलाषा जाग उठी है | अपनी पराधीनता को देखकर एक कठपुतली गुस्से से भर उठती है | गुस्से में ही बोल उठती है कि हमारे पीछे इतने धागे क्यों है ? उन्हें बंधन में क्यों रखा गया है ? वह बंधनमुक्त होना चाहती है  और स्वतंत्र होकर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है |उनके स्वर में विद्रोह का भाव है |

विशेष-    कविता  प्रश्न शैली  में है|

             पुतलियों का मानवीकरण किया गया है |

            स्वतन्त्रता सबको प्रिय है , यह भाव व्यक्त हुआ है |

2 )  सुनकर बोलीं और –और

      कठपुतलियाँ

      कि हाँ

     बहुत दिन हुए

    हमें अपने मन के छंद छुए

   मगर.......

  पहली कठपुतली सोचने लगी –

ये कैसी इच्छा

मेरे मन में जगी?

शब्दार्थ – मन के छंद छुए –मन में खुशी  आना

प्रसंग – पूर्ववत

इन पंक्तियों में कवि ने कठपुतलियों के मन भावों को व्यक्त किया है |

सरलार्थ – एक कठपुतली को दुख से बाहर निकलने के लिए  विद्रोह करता देखकर अन्य कठपुतलियों ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलाई | वे कहने लगीं कि हमें बंधन में रहते हुए बहुत दिन बीत गए, न हमारे मन का दुख दूर हुआ और न मन मे खुशी आई जिससे  हम खुश होकर रहे |

          स्वतन्त्रता सबको अच्छी लगती है | लेकिन जब पहली कठपुतली पर सबकी जिम्मेवारी आई तो वह स्वयम् से प्रश्न करने लगती है कि उसके मन में ये कैसी इच्छा जाग उठी ?  इस विषय में बिना सोचे-समझे कदम उठाना उचित नहीं है |

विशेष -  पराधीनता में खुश नहीं रहा जा सकता है , यह भाव प्रकट हो रहा है |

 

 

प्रश्न )  कठपुतली को क्यों गुस्सा आया ?

उत्तर ) कठपुतली के आगे पीछे धागे ही धागे थे ,अर्थात वह कुछ भी करने को स्वतंत्र नहीं थी | वह पराधीन रहकर जीवन बिता रही थी | ऐसा जीवन उसे लंबे समय तक जीना पड़ रहा था | अपनी स्वतन्त्रता की चेतना जागृत होने पर कठपुतली को गुस्सा आया |

 

प्रश्न ) कठपुतली को अपने पाँवों पर खड़ी होने की इच्छा है ,लेकिन वह क्यों नहीं खड़ी होती ?

उत्तर ) कठपुतली को अपने पाँवों पर खड़ी होने की इच्छा है ,लेकिन वह नहीं खड़ी हो पाती है क्योंकि उस पर बाकी कठपुतलियों की भी जिम्मेदारी  आती है | अकेले उसी के स्वतंत्र होने से कोई बात नहीं बनने वाली है | जरूरत है सभी कठपुतलियों के स्वतंत्र होने की |

 

प्रश्न ) पहली कठपुतली की बात दूसरी कठपुतली को क्यों अच्छी लगी ?

उत्तर ) पहली कठपुतली की बात दूसरी कठपुतली को इसलिए अच्छी लगी क्योंकि वे भी इस बंधनयुक्त  जीवन से मुक्त होना चाहती थी | आखिर स्वतंत्रता सबको अच्छी लगती है |

 

प्रश्न ) बहुत दिन हुए / हमें  अपने मन के छंद छुए |’  इस पंक्ति का अर्थ और क्या हो सकता है ?- 

उत्तर )  बहुत दिन हो गए मन का दुख दूर नहीं हुआ और न मन में खुशी आई |

प्रश्न ) नीचे दो-दो स्वतन्त्रता आंदोलन के वर्ष दिये गए है | इन दोनों आंदोलनों के दो-दो स्वतन्त्रता सेनानियों के नाम लिखिए |

 क)  सन्  1857....

सन्  1942 ......

उत्तर )  सन् 1857-  मंगल पांडे .रानी लक्ष्मीबाई

           सन् 1942 -   महात्मा गांधी ,सरदार वल्लभ भाई पटेल |

 

 

 

 

भाषा की बात

प्रश्न ) जब काठ और पुतली  दो शब्द  एक साथ हुए कठपुतली शब्द बन गया और बोलने में सरलता आ गई | इस प्रकार के कुछ और शब्द बनाइए |

उत्तर )  काठ (कठ)  से बना -  कठगुलाब ,  कठफोड़ा

            हाथ (हथ ) से बने शब्द -   हथकंडा ,  हथकड़ी, हथगोला,  हथकरघा ,

           सोना ( सोन) से बने शब्द -   सोन जुही , सोन हला , सोन केला |

         मिट्टी (मठ ) से बने शब्द   -  मठाधीश , मठधारी, मठपति |

 

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