Tuesday, September 14, 2021

संधि

 

संधि

वर्णों  के पारस्परिक मेल को संधि कहते है| जैसे

 देव+ आलय = देवालय   (अ + आ = आ )

विद्या + आलय = विद्यालय ( आ + आ = आ)

महा + ईश     = महेश     ( आ + ई = ए )

सदा + एव     = सदैव     ( आ + ए = ऐ)

यदि + अपि    = यद्यपि   ( इ  + अ = य )

उत्  + ज्वल   = उज्ज्वल   ( त्+ ज = ज्ज )

सु   + आगत  = स्वागत    ( उ + अ = व )

निः  + धन      = निर्धन    ( :  + ध =र्ध)

 

संधि के भेद

हिन्दी में संधि तीन प्रकार की होती है |

1 स्वर संधि            2 व्यंजन संधि            3 विसर्ग संधि

1 स्वर संधि – दो स्वरों के मेल से जो परिवर्तन होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं| इसके पाँच भेद हैं-

i)        दीर्घ संधि

ह्रस्व या दीर्घ अ,, उ के आगे क्रमश: ह्रस्व या दीर्घ अ,, उ – आ जाए तो दोनों मिलकर

क्रमश: आ,, ऊ बन जाते हैं, जैसे –

अ+ अ= आ

 

मत + अनुसार = मतानुसार                पर + अस्त = परास्त

पुष्प + अंजलि = पुष्पांजलि               हिम + अंशु = हिमांशु

पर  + अधीन = पराधीन                   हिम + अद्रि = हिमाद्रि

न्याय + अधीश = न्या                   मूल्य +अंकन =मूल्यांकन


अ + आ = आ

   

भोजन + आलय = भोजनालय             मरण + आसन्न  =  मरणासन्न

सत्य  + आग्रह  = सत्याग्रह             धर्म  + आत्मा   =  धर्मात्मा

रत्न   + कार   = रत्नाकर               गज  +  आनन  =  गजानन  

न्याय  + धीश   = न्यायधीश             छात्र  + आवास  =  छात्रावास


आ + अ = आ

विद्या + अर्थी = विद्यार्थी                     यथा + अर्थ   = यथार्थ

परीक्षा + अर्थी = परीक्षार्थी                      रेखा  + अंकन = रेखांकन 

विद्या + अभ्यास = विद्याभ्यास                 सेवा  + अर्थ   = सेवार्थ

सीमा  + अंकन  = सीमांकन                   परीक्षा + अभ्यास = परीक्षाभ्यास


आ + आ = आ

 

महा + आत्मा = महात्मा                       विद्या  +  आलय = विद्यालय

महा + आशय = महाशय                       शिवा   +  आलय = शिवालय

वार्ता + लाप  = वार्तालाप                      चिकित्सा + आलय  = चिकित्सालय

इ + इ = ई

 

अभि  + इष्ट = अभीष्ट                       कवि + इन्द्र  = कवीन्द्र

अति + इव  = अतीव                          मुनि + इन्द्र  = मुनीन्द्र

हरी + इच्छा = हरीच्छा                         अति + इव  = अतीव

इ + ई = ई

          

 


कपि + ईश  = कपीश                          गिरि +ईश = गिरीश

मुनि + ईश्वर  =मुनीशवर                       परि +ईक्षा = परीक्षा

हरी +ईश  =हरीश                              कवि +ईश्वर  =कवीश्वर

ई + इ= ई


 

शची +इंद्र = शचीन्द्र                           लक्ष्मी + इच्छा =लक्ष्मीच्छा

पत्नी + इच्छा  =पत्नीच्छा                      नारी + इच्छा  = नारीच्छा

नारी+ इंदर =नरिंधर                             नदी +इंद्र = नदीन्द्र  

  + ई = ई


 

रजनी +ईश = रजनीश                            मही +ईश =महीश

नदी + ईश =नदीश                               नारी +ईश्वर =नारीश्वर

जानकी + ईश = जानकीश                    मही + ईश्वर =महीश्वर

 

उ + उ = ऊ 

 


भानु  + उदय  = भानूदय                 साधु + उपदेश =  साधूपदेश

वधू +उत्सव =   वधूत्सव                  सू + उक्ति   =  सूक्ति

गुरु + उपदेश =  गुरूपदेश                 लघु + उत्तर =  लघुत्तर

 

उ + ऊ = ऊ

 

       

प्रभु + ऊर्मि  = प्रभूर्मी               लघु + ऊर्मि = लघूर्मि

अंबु + ऊर्मि =  अंबूर्मि                सिंधु + ऊर्मि =सिंधूर्मि

 

ऊ +ऊ = ऊ

 


भू + ऊर्जा = भूर्जा                                    

 

अ + इ = ए 

 


राज + इंद्र  = राजेंद्र                        स्व + इच्छा  =  स्वेच्छा     

धीर + इंद्र  =  धीरेंद्र                       शुभ + इच्छा  =  शुभेच्छा  

ज्ञान + इंद्र = ज्ञानेंद्र                        धरम + इंद्र = धर्मेंद्र

नर +  इंद्र =  नरेंद्र                         वीर + इंद्र  = वीरेंद्र

 

अ + ई  = ए 

 


गण + ईश = गणेश                         सुर + ईश = सुरेश 

सोम + ईश = सोमेश                         नर + ईश = नरेश

योग + ईश = योगेश                         परम +ईश्वर = परमेश्वर  

दिन  + ईश = दिनेश                         राम + ईश्वर =रामेश्वर

 

आ+ इ = ए 


 

यथा + इष्ट = यथेष्ट                      राजा + इंद्र = राजेन्द्र

महा  + इंद्र = महेंद्र                        रमा + इंद्र =  रमेंद्र


आ+ ई = ए


 

लंका + ईश  = लकेंश                             महा + ईश = महेश 

महा +ईश्वर = महेश्वर                             राजा + ईश  = राजेश

रमा + ईश = रमेश                                उमा + ईश  = उमेश

 

अ + उ = ओ  

 


धर्म +उदय  = धर्मोदय                          सूर्य + उदय  = सूर्योदय

विवाह + उत्सव = विवाहोत्सव                     लोक + उक्ति = लोकोक्ति

चंद्र   + उदय  = चंद्रोदय                        हित + उपदेश = हितोपदेश

                                                  

आ + उ = ओ 

 


महा + उदय = महोदय                          गंगा + उदक = गंगोदक

महा + उसत्व  = महोत्सव                       महा + उदधि = महोदधि

 

अ + ऊ = ओ 

 


जल +उर्मि = जलोर्मि                            समूद्र + उर्मि  = समुद्रोर्मी

नव + ऊढा = नवोढा                             नव + उर्मि  =  नवोर्मि

 

आ + ऊ = ओ  


 

गंगा + ऊर्मि = गंगोर्मि                     महा +ऊर्मि = महोर्मि

महा + ऊर्जा = मर्होजा                      दया + ऊर्मि = दयोर्मि

 

  +  ऋ = अर्

 

 


देव + ऋषि = देवर्षि                       सप्त + ऋषि = सप्तर्षि

राज + ऋषि = राजर्षि                      ब्रह्म + ऋषि =ब्रह्मर्षि

 

  +  ऋ = अर्

 


 

महा + ऋषि = महर्षि                          राजा + ऋषि = राजर्षि


 ग ) वृद्धि संधि

यदि या के बाद या हो तो दोनों मिलकर हो जाते हैं, जैसे

अ + ए = ऐ

 

एक + एक  = एकैक                         लोक + एषणा = लोकैषणा

धन + एषणा = धनैषणा                       वित  + एषणा = वितैषणा


आ + ए = ऐ

 

सदा + एव  = सदैव                          यथा + एव  = यथैव

तथा + एव = तथैव

 

अ + ऐ = ऐ

 


मत + ऐक्य = मतैक्य                         देव + ऐश्वर्य = देवैश्वर्य

लोक + ऐक्य = लोकैक्य


आ + ऐ = ऐ

 


महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य


II) यदि या के बाद या हो तो मिलकर हो जाते हैं ,जैसे

अ + ओ = औ

 

  

दंत + औष्ठ = दंतौष्ठ                     परम + ओज = परमौज

अधर + ओष्ठ = अधरौष्ठ                   वन  + औषधि = वनौषधि

अ + औ = औ   

 

परम + औषध = परमौषध                      वन + औषध = वनौषध

परम + औदार्य = परमौदार्य

आ + ओ = औ

 


महा +औदार्य = महौदार्य                       महा + औषध =महौषध


घ) यण संधि

यदि इ या ई के बाद कोई भिन्न स्वर आ जाए तो  या का य बन जाता है, जैसे –

इ + अ = य

 

 

अति + अधिक = अत्यधिक                    यदि + अपि = यद्यपि


इ +  आ = या

 

अभि + आगत = अभ्यागत                    परि + आवरण = पर्यावरण

वि   + आयाम = व्यायाम                    अति + आचार = अत्याचार


ई + अ = य

 

 

नदी + अर्पण = नद्यर्पण                       देवी + आगमन = देव्यागमन


इ + उ = यु

 

उरि + उक्त = उपर्युक्त                        प्रति + उपकार = प्रत्युपकार

इ + ऊ = यू

 

 

वि + ऊह = व्यूह                             नि + ऊन = न्यून

इ + ए = ये

 


प्रति + एक = प्रत्येक

ई + ऐ= यै


 

देवी + ऐश्वर्य = देव्यैश्वर्य


Iv) यदि उ या ऊ के बाद कोई उ, ऊ से भिन्न स्वर आए तो उ या ऊ का व हो जाता है, जैसे-

उ + अ = व


 

सु +आगत = स्वागत               मनु + अंतर = मन्वंतर

अनु + अय = अन्वय               सु + अल्प   = स्वल्प


उ + आ = वा

 


सु + आगत =  स्वागत                             

उ + इ = वि

 


अनु + इति = अन्विति

उ + ए  = वे

 


अनु + एषण = अन्वेषण

ऋ + अ   =र


 

पित्र + अनुमति = पित्रनुमती

ऋ + आ   =रा


 

मात्र + आज्ञा = मात्राज्ञा                       पित्र + आज्ञा = पित्राज्ञा

ऋ + इ    =रि


 

मातृ + इच्छा = मात्रिच्छा

अयादि संधि

यदि या ’, के बाद कोई इनसे भिन्न स्वर आ जाए तो का अय’, का आय’,

का आय’, का अवतथा का आव बन जाता है, जैसे-

ए + अ = अय

 


ने + अन = नयन                        शे  + अन = शयन


  + अ =आय

 


गै + अक = गायक                     गै + अन  = गायन


  + अ =अव 

 


भो + अन = भवन                     पो + अन = पावन

   + अ =आव 

 



पौ  + अन = पावन                    पौ + अक = पावक


   + इ =आवि 

 



नौ   + इक = नाविक

औ + उ = आवु  

 


भौ  + उक = भावुक 

 

 

 




 

Saturday, September 11, 2021

विशेषण

 

विशेषण

जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता का बोध कराते हैं, वे विशेषण कहलाते हैं |

लाल कार खड़ी है|             तीन कबूतर उड़ रहे हैं|     यह घर मेरा है|

विशेष्य – विशेषण जिन शब्दों की विशेषता बताते हैं, वे शब्द विशेष्य कहलाते हैं|

उपर दिये गए वाक्यों में कार, कबूतर , घर  विशेष्य है|

प्रविशेषण- विशेषणों की भी विशेषता बताने वाले शब्द प्रविशेष्ण कहलाते हैं|

उदाहरण- सचिन बहुत मेहनती है|

        भीम बहुत वीर था |

        आज बहुत अधिक गर्मी है|

विशेषण के भेद  चार है |

1    गुणवाचक विशेषण – जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम के गुण,दोष,रंग,आकार,अवस्था आदि का बोध कराए,उन्हें गुणवाचक विशेषण कहते हैं ; जैसे – होशियार,दुष्ट, गुलाबी,लंबा,वार्षिक,खट्टा,खुरदरा आदि|

असीम बुद्धिमान बालक है|              झंडे में सफेद,केसरी और हरा रंग है|

बुद्धिमान, सफेद,केसरी और हरा विशेषण है |

2    परिमाणवाचक विशेषण- जिन शब्दों से संज्ञा या सर्वनाम के माप तौल का पता चले,उन्हें परिमाणवाचक विशेषण कहते है| दो मीटर, पाँच किलो  आदि|

परिमाणवाचक विशेषण दो प्रकार के हैं|

I) निश्चित परिमाणवाचक विशेषण –जिन विशेषण शब्दों से किसी निश्चित परिमाण का बोध हो, उन्हें निश्चित परिमाणवाचक विशेषण कहते हैं जैसे-

दो किलो चावल                            तीन लीटर दूध

Ii) अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण – जिन शब्दों से किसी निश्चित माप-तौल का पता नहीं चलता, उन्हें अनिश्चित परिमानवाचक विशेषण कहते हैं|

चाय में थोड़ी सी चीनी दाल दे |  

बाज़ार से कुछ फल ले आए |

3 संख्यावाचक विशेषण – जो विशेषण शब्द किसी संज्ञा या सर्वनाम शब्द की संख्या या क्रम का बोध कराते हैं, उन्हें संख्यावाचक विशेषण कहते हैं ; जैसे-

कक्षा में चार पंखे हैं |                  विद्यालय में बीस कमरे हैं|

संख्यावाचक विशेषण  विशेषण दो प्रकार के हैं|

निश्चित संख्या वाचक विशेषण –जिन विशेषण शब्दों से निश्चित संख्या का पता चले, उन्हें निश्चित संख्या वाचक विशेषण कहते हैं|

कमरे में दो खिड़कियाँ हैं|                गमले में दो फूल हैं|

अनिश्चित संख्यावाचक  विशेषण – जिन विशेषण शब्दों से किसी निश्चित संख्या का पता नहीं चलता , उन्हें अनिश्चित संख्या वाचक विशेषण कहते हैं –

जैसे टोकरी में  कुछ टॉफियाँ पड़ी हैं|

 बाग में कुछ लोग घूम रहे हैं|

4    सार्वनामिक विशेषण – जो सर्वनाम विशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं, उन्हें सार्वनामिक विशेषण कहते हैं; जैसे –

यह घर मेरा है|                             वह महिला बुला रही है |

सर्वनाम और सार्वनामिक विशेषण में अंतर –

जो शब्द संज्ञा के स्थान पर प्रयोग होते हैं वे सर्वनाम कहलाते हैं तथा जो सर्वनाम संज्ञा शब्द से पहले आकर विशेषता का कार्य करे वे सार्वनामिक विशेषण कहलाते हैं जैसे –

  सर्वनाम                               सर्वनामिक विशेषण

  वह पढ़ता है |                          वह बालक  पढ़ता है|

  किसी ने बुलाया |                        किसी बालक ने बुलाया|

 

 

 

 

 

रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  

                                       

 कहि रहीम  संपति सगे ,बनत बहुत बहु रीत  |

                                     विपत्ति कसौटी जे कसे ,तेई तेई साँचे मीत ||

                                    शब्दार्थ -  संपति: धन-दौलत         , बहु:  अनेक                  रीत:विधि

                                                   विपत्ति:  संकट              कसौटी: जांच                  जे: जो

                                                    तेई:  वे ही                      साँचे: वास्तविक          मीत: मित्र              

                                            प्रसंग –प्रस्तुत दोहा वसंत भाग दो में संकलित” रहीम के दोहे “ नामक पाठ से लिया गया है | इसके रचयिता  कवि रहीम  है |

             सरलार्थ -कवि कहता है कि किसी भी मनुष्य के पास जब धन –संपत्ति रहती है , तब बहुत  लोग अनेक प्रकार से  उसके अपने बनने की कोशिश करते हैं | कि मैं तो तुम्हारे उस रिशतेदार का रिशते दार हूँ | अरे तुम तो मेरे मित्र रहे हो, आदि –आदि  | सच्चे मित्र तो वो होते हैं , जो  मुसीबत के समय साथ नहीं छोड़ते हैं ओर वे मुसीबत के समय जांच में  खरे   उतरते हैं |

 

जाल परे जल जात बहि ,तजि मीनन को मोह |

रहिमन मछरी नीर को ,तऊ छाड़ति छोह ||2||

                 शब्दार्थ -  परे: पड़ने पर,            जात बहि: बह जाता है,  तजि:छोडकर,  मीनन: मछलियाँ

              मोह: प्रेम ,   नीर:  पानी,   तऊ: तब भी ,  छोह:लगाव

 

प्रसंग –पूर्ववत |

इन पंक्तियों में कवि ने मछलियों के नीर –प्रेम का वर्णन किया है |

सरलार्थ कवि रहीम कहते है कि सागर ,नदी या तालाब में मछलियां पकड़ने के लिए जब जाल डाला जाता है ,तो जाल में से पानी बह जाता है अर्थात वह बंधक बनकर मछलियों का साथ देने को तैयार नहीं होता है |उसे मछलियों से कोई मोह नहीं रह जाता है |ऐसी स्थिति मे भी मछलियो पानी से अपना मोह या प्रेम नहीं छोड पाती हैं और वे पानी के अभाव में अपने प्राण त्याग देती है |

 

तरुवर फल नहिं खात है,सरवर पियत न पान|

-कहि रहीम परकाज हित ,संपित –सचहिं सुजान ||3||

                       शब्दार्थ -            तरुवर:  पेड़ ,  खात: खाना,    सरवर: सरोवर,  पियत :  पीना,  पान :पानी       

                               परकाज: दूसरों का काम,    हित:   भलाई,       सचहिं:  इकट्ठा करना,          सुजान: अच्छे लोग

                    प्रसंग - पूर्ववत |

                   इन पंक्तियों मे कवि ने प्रकृति के परोपकारी स्वभाव का वर्णन किया है |

                     सरलार्थ –       कवि रहीम कहते हैं कि  प्रकृति सदा से ही परोपकारी स्वभाव की रही है | प्रकृति  के अंग पेड़ अपने फल स्वय नहीं खाते हैं ,और तालाब कभी भी अपना पानी स्वयं नहीं पीते हैं | तालाब  अपना पानी दूसरों के लिए धारण करते हैं |इसी प्रकार सज्जन भी अपनी संपत्ति का संचय दूसरों के लिए ही करते हैं अर्थात अपने धन को दूसरों की भलाई में लगा देते हैं |

 

                   थोथे बादर क्वार  के , ज्यों रहीम घहरात |

                   धनी पुरुष निर्धन भए, करें पाछिली बात||

                  शब्दार्थ – थोथे बादर:जलविहीन बादल, क्वार: आश्विनी माह,                                                            घहरात:               बादलों   का      गर्जना,               निर्धन:   गरीब,      पाछिली :    पिछली      

                                                                                                                                                               

                  प्रसंग – पूर्ववत|

                 सरलार्थ – इन पंक्तियों में समय बदल जाने पर भी कुछ लोगों द्वारा गर्वीली बातें करने की आदत छोड़ पाने का वर्णन किया है|

                            कवि कहते है कि अपने पुराने समय में धनी लोग सम्पन्न रहते हुए जिन बातों के आदि हो जाते है वे धन वैभव चला जाने पर भी उ आदतों को नहीं छोड़ते और अपने पुराने दिनों की बड़बोलेपन  की बातें ठीक उसी प्रकार करते है जैसे क्वार माह के जलहीन बादल गरजते है|अर्थात वर्षा ऋतु (आषाढ़ , सावन,भादों) के बादल जलयुक्त होते हैं और जब गरजते है तो वर्षा की संभावना बनी रहती हैपरंतु क्वार माह के बादल गरजते तो है पर बरसते नहीं है|

 

                         धरती सी की रीत है,सीत घाम और मेह|

                                                  जैसी परे सो सही रहे, त्यों रहीम यह देह ||

                            शब्दार्थ –         सी: तरह             रीत : तरीका,ढंग            सीत: सर्दी                        घाम:  धूप          मेह:  बादल         परे:  पड़ जाएँ                 सहि: सहन करना       त्यों:  उसी प्रकार              देह: शरीर

                         इन पंक्तियों में कवि ने धरती और मनुष्य के शरीर की सहनशीलता की तुलना की है|

                        सरलार्थ – मनुष्य का शरीर भी परिस्थितियों के अनुसार खुद को समायोजित कर लेता है| इस संबंध में कवि रहीम कहते हैं कि शरीर को सर्दी ,गर्मी,वर्षा अर्थात विषम परिस्थितियों में कठिनाइयों को उसी प्रकार सहना पड़ता है,जैसे धरती सर्दी,गर्मी और वर्षा की अनेक कठिनाइयों को सहन करती है , अर्थात सर्दी, गर्मी और वर्षा सहना उसकी परंपरा बन गई है |

                        विशेष-  धरती की सी रीत में उपमा अलंकार है |

                        दोहा   छंद का प्रयोग हुआ है|

 

 

 

 

चौसर का खेल व द्रौपदी की व्यथा

 

पाठ 15 चौसर का खेल व द्रौपदी की व्यथा

प्रश्न) चौसर का खेल सारे अनर्थ की जड़ होता है “यह जानकर भी युधिष्ठिर ने चौसर खेलने का निर्णय क्यों लिया ?

उत्तर ) अनर्थ हो जाने की जानकारी होते हुए भी युधिष्ठर ने चौसर खेलने का निर्णय लिया क्योंकि –

i)                     राजवंशों की रीति के अनुसार बुलावा मिलने पर उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है|

ii)                   युधिष्ठिर  को डर था कि खेल में शामिल न होने को ही धृतराष्ट्र अपना अपमान न समझ बैठें और यहीं लड़ाई का कारण न बन जाए |

iii)                  युधिष्ठिर  चौसर  के खेल के शौकीन थे, भले ही उन्हें अच्छी तरह खेलना न आता था |

प्रश्न) प्रातिकामी कौन था ? वह द्रौपदी के पास रनवास में क्यों गया ?

उत्तर ) प्रातिकामी दुर्योधन का  सारथी था | युधिष्ठिर  जुए में द्रौपदी को दुर्योधन के हाथों हार चुका थे| प्रातिकामी दुर्योधन के आदेशानुसार द्रौपदी को सभा मंडप में ले जाने के लिए आया |उसने द्रौपदी से कहा “आप दुर्योधन के अधीन हो गई है| राजाज्ञा के अनुसार अब आपको दृतराष्ट्र के महल में दासी का काम करना है| मैं आपको ले जाने के लिए आया हूँ |”

प्रश्न) युधिष्ठिर  के पुनः चौपड़ खेलने का क्या परिणाम रहा ?

उत्तर ) युधिष्ठिर के द्वारा पुनः चौपड़ खेलने का परिणाम यह रहा कि वह पुनः हार गए | इसके परिणामस्वरूप पांडवों को बारह वर्ष का वनवास तथा एक वर्ष का अज्ञातवास बिताना था | यदि इस अवधि में उनका पता चल जाए तो यह अवधि उन्हें पुनः वनवास तथा अज्ञातवास के रूप में बितानी थी|

शकुनि का प्रवेश

 

पाठ 14 शकुनि का प्रवेश

प्रश्न) युधिष्ठिर ने क्या शपथ ली थी?

उत्तर ) युधिष्ठिर ने शपथ ली थी कि आज से तेरह वर्ष तक अपने भाइयों तथा अन्य बंधु-बाँधवों से किसी तरह का वैर नहीं रखेंगे | वह उनकी इच्छानुसार ही चलेंगे जिससे कि मनमुटाव का कोई डर न रहे | वे अपने मन से क्रोध को निकाल देंगे तथा कौरवों कि इच्छानुसार ही काम करेंगे |

प्रश्न ) शकुनि ने दुर्योधन को पांडवों से राज्य प्राप्त करने का क्या सहज उपाय बताया ?

उत्तर ) शकुनि ने बताया  युद्ध खतरनाक काम है | पांडवों से राज्य प्राप्त करने का सहज उपाय है कि उन्हें चौसर का खेल खेलने के लिए आमंत्रित किया जाए| इस खेल के शौकीन युधिष्ठिर को खेलना भी नहीं आता है| इससे  उन्हें हराकर आसानी से उनका राज्य प्राप्त किया जा सकता है|

  प्रश्न) चौसर के खेल के बारे में विदुर ने दृतराष्ट्र को क्या बताया ?

उत्तर ) चौसर के खेल दुष्परिणामों के बारे में विदुर ने दृतराष्ट्र को क्या बताया ?

उत्तर ) चौसर के खेल के दुष्परिणामों के बारे में दृतराष्ट्र को बताते हुए विदुर ने आगाह किया कि इस खेल के कारण हमारे कुल के लोगों में आपसी मनमुटाव और झगड़े फसाद बढेंगे | इससे हम सभी पर विपदा आएगी जो कौरव –कुल के नाश का कारण बन जाएगी |

जरासंध

 

पाठ 13 जरासंध

प्रश्न) पांडवों द्वारा किए जाने यज्ञ में जरासंध बाधक था, कैसे ?

उत्तर ) वह अत्यंत शक्तिशाली राजा था , जिसने सभी राजाओं को जीतकर अपने वश में कर रखा था |सभी उससे पराजित हो चुके थे और उससे डरते थे | शिशुपाल जैसे शक्ति सम्पन्न राजा भी उसकी अधीनता स्वीकार कर चुके थे | श्री कृष्ण और उनके बंधु भी हार चुके थे | इस प्रकार राजसूय यज्ञ में बाधक बन रहा था |

प्रश्न) जरासंध की कैद में बंदी राजा कैसे मुक्त हुए ?

उत्तर ) जरासंध से युद्ध का निश्चय हो जाने पर भीम,अर्जुनऔर श्री कृष्ण ब्राह्मण वेष में जरासंध के पास गए | उनका आदर सत्कार किया| आधी रात के बाद जब वह अतिथियों से बातचीत करने आए तो अतिथियों ने अपना सही परिचय देकर द्वंद्व युद्ध के लिए ललकारा | भीम के साथ द्वंद्व युद्ध में जरासंध मारा गया|

प्रश्न) शिशुपाल को श्री कृष्ण की अग्र पूजा क्यों अच्छी न लगी ?

उत्तर ) शिशुपाल एक शक्तिसम्पन्न राजा था| पांडवों द्वारा जरासंध को मारने में श्रीकृष्ण ही योजनाकार थे | इसे वे श्री कृष्ण की कुचाल समझता था इसके  अलावा वह श्री कृष्ण को मामूली सा व्यक्ति समझता था  इसलिए उसे श्री कृष्ण की अग्र –पूजा अच्छी न लगी|

समास

  समास विनय अपने माता और पिता के साथ देव के मंदिर गया | चार राहों के समूह से गुजरते   हुए   उसने घोड़े पर सवारी करते हुए छ्त्रपति शि...