पाठ
- 14 एक कहानी यह भी है
(मन्नू भंडारी)
प्रश्न 1) लेखिका के व्यक्तित्व पर
किन – किन व्यक्तियों का किस रूप में प्रभाव पड़ा ?
उत्तर ) लेखिका के व्यक्तित्व पर उनके पिता जी
और प्राध्यापिका शीला अग्रवाल का प्रभाव पड़ा था | लेखिका को
देश प्रेमी और समाज के प्रति जागरूक बनाने में भी उनके पिता का सहयोग रहा है | उन्होंने उसे रसोईघर से दूर रखकर एक निडर महिला बनाया| लेकिन लेखिका की तुलना उनकी बड़ी बहन से करके उसमें हीन भावना पैदा की | लेखिका को सदा अध्ययनशील, क्रांतिकारी व आंदोलनकारी
बनाने में शीला अग्रवाल का भी योगदान रहा | उसे महान
साहित्यकारों की किताबें उपलब्ध कराई, जिससे उनके मन में
साहित्य के प्रति आकर्षण पैदा हुआ | आगे चलकर वे स्वयं महान
लेखिका बनीं |
प्रश्न 2 ) इस आत्मकथ्य में लेखिका
के पिता ने रसोई को भटियारखाना कहकर क्यों संबोधित किया ?
उत्तर ) भटियारखाना का शाब्दिक अर्थ है- वह
स्थान जहाँ सदा भट्टी जलती रहती है अथवा चूल्हा जलता रहता है | यहाँ लोग भट्टी पर आकर जमा हो जाते हैं और खूब शोर मचाते हैं | लेखिका के पिता एक महान लेखक, विद्वान व समाज-सुधारक
और देशभक्त थे| वे
अपने बच्चों को घर-गृहस्थी तक सीमित नहीं रखना चाहते थे, विशेषकर
लड़कियों को | वे उन्हें उदार, विचारवान
जागरूक नागरिक बनाना चाहते थे | वे रसोईघर के कामों को हीन
समझते थे | इसलिए उन्होंने रसोईघर को भटियारखाने की संज्ञा
दी |
प्रश्न 3) वह कौन सी घटना थी जिसके
बारे में सुनने पर लेखिका को न अपनी आँखों
पर विश्वास हो पाया और न अपने कानों पर ?
उत्तर ) लेखिका के विरुद्ध अनुशासनात्मक
कार्यवाही करने की लिए कॉलेज के प्राचार्य का पत्र आया | इस संबंध में उनके पिताजी को कॉलेज बुलाया | पिता
जी पत्र देखकर आग-बबूला हो उठे |वह इसलिए कॉलेज गए | पिताजी के कॉलेज
जाने पर लेखिका पड़ोस में बैठ गई ताकि पिता के क्रोध से बचा जा
सके | किन्तु लेखिका के कारण उनका सिर गर्व से ऊंचा था |
उन्होंने बताया कि लेखिका का कॉलेज की लड़कियों पर पूरा रौब है तथा पूरा कॉलेज उसके
इशारों पर चलता है | यह सुनकर लेखिका को अपने कानों पर
विश्वास नहीं हुआ लेकिन यह सच्चाई थी |
प्रश्न 4) लेखिका की अपने पिता से
वैचारिक टकराहट को अपने शब्दों में लिखिए |
उत्तर ) लेखिका के पिता के अनुसार औरतों को
रसोई की चारदीवारी तक ही सीमित ही नहीं रहना चाहिए बल्कि अपनी प्रतिभा व क्षमता का
प्रयोग घर के बाहर भी करना चाहिए| इससे उन्हें यश व
सम्मान मिलेगा | वे आधुनिकता के समर्थक थे | किन्तु वे यह भी नहीं देख सकते थे कि लड़कियां लड़कों के साथ मिलकर स्वतन्त्रता
आंदोलन में भाग लें | लेकिन लेखिका के लिए पिता जी की सीमाओं
में बंधना बहुत कठिन था | इसलिए लेखिका की अपने पिता जी से
वैचारिक टकराहट रहती थी |
प्रश्न 5 ) इस आत्मकथ्य के आधार पर
स्वाधीनता आंदोलन के परिदृश्य का चित्रण करते हुए उसमें मन्नू जी की भूमिका कों
रेखांकित कीजिए|
उत्तर ) लेखिका के विद्यार्थी जीवन का समय देश
की स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए आंदोलनों की प्रगति का समय था| चारों और प्रभात फेरियाँ, हड़तालें, जुलूस ,भाषणबाजी हो रही थी |
लेखिका देश की राजनीति के प्रति जागरूक थी | उसने राष्ट्र
स्तर पर होने वाले आंदोलनों में बढ़ – चढ़कर भाग लिया | प्रभात
फेरियाँ निकाली, कॉलेज में हड़तालें करवाईं अपने भाषणों से भीड़
में जोश भर देना आदि कार्य किए| हिन्दी अध्यापिका ने जोश के
साथ कार्य करने में लेखिका को प्रेरित किया |
रचना व अभिव्यक्ति पर आधारित
प्रश्न
प्रश्न 6) लेखिका ने बचपन में अपने
भाइयों के साथ गिल्ली डांडा तथा पतंग
उड़ाने जैसे खेल भी खेले, किन्तु लड़की होने
के कारण उनका दायरा घर की चारदीवारी तक सीमित था | क्या आज
भी लड़कियों के लिए स्थितियाँ ऐसी ही हैं या बदल गई हैं, अपने
परिवेश के आधार पर लिखिए|
उत्तर ) वह लड़कों की भांति बाहर खेलने नहीं जा
सकती थी | लड़की होने के कारण उसकी सीमाएँ घर
की चार दीवारी तक ही सीमित थी | लड़कियां हर क्षेत्र में
लड़कों के समान ही आगे बढ़ रही हैं | अब उनके कार्य की सीमा घर
की चार दीवारी से बाहर की दुनिया भी हैं | अब आत्मनिर्भर बन चुकी है | लड़कियों के
विकास करने हेतु माता - पिता भी सहयोग कर रहे हैं | आज के
युग में लड़कियाँ आगे भी बढ़ रही हैं | वे समाज व राष्ट्र के
प्रति जागरूक हैं |
प्रश्न 7) मनुष्य के जीवन में
आस-पड़ोस का बहुत महत्व होता है | परंतु
महानगरों में रहने वाले लोग प्राय: ‘पड़ोस –कल्चर से वंचित रह जाते हैं| इस
बारे में अपने विचार लिखिए |
उत्तर ) निश्चय ही मनुष्य के जीवन में आस-पड़ोस का अत्यधिक महत्व होता है| बच्चों में निर्भयता, आत्मीयता और अपनेपन के भाव का
विकास होता है | बड़े शहरों में रहने वाले लोग प्राय: पड़ोस कल्चर के सुख से
प्राय: वंचित रहते है | वहाँ सब लोग अपने तक सीमित रहते है | बच्चे का समाज से परिचय आस-पड़ोस के माध्यम से ही होता है | आस-पड़ोस के लोगों से मिलजुल रहने की भावना का विकास होता है | अच्छे-बुरे की पहचान भी आस-पड़ोस के माध्यम से ही होती है | बड़े शहरों में लोग एकाकीपन में
रहने के कारण असुरक्षा, असहाय और मानसिक तनाव के शिकार हो
जाते है | इसलिए मानवीय जीवन में आस-पड़ोस का होना बहुत
आवश्यक हैं |
प्रश्न 8) लेखिका द्वारा पढे गए
उपन्यासों की सूची बनाइए और उन उपन्यासों को अपने पुस्तकालय में खोजिए |
उत्तर ) लेखिका ने ‘सुनीता’, ‘शेखर एक जीवनी’, ‘नदी के द्वीप’, ‘त्यागपत्र’, ‘चित्रलेखा’, उपन्यासों के अतिरिक्त शरत, प्रेमचंद्र, जैनेन्द्र, अज्ञेय, यशपाल
भगवतीचरण वर्मा के अनेक उपन्यास पढे थे |
अन्य प्रश्न
प्रश्न ) लेखिका के कुंठित होने तथा
हीन भावना से ग्रसित होने के क्या कारण थे ?
उत्तर ) लेखिका बचपन से काले रंग व शारीरिक
दृष्टि से कमजोर थी | जबकि लेखिका की बड़ी बहिन, जो उससे दो वर्ष बड़ी थी, स्वस्थ व गोरे रंग की थी | लेखिका के पिता दोनों बहिनों की तुलना करते और उनकी बड़ी बहन की तारीफ
करते | इसका लेखिका के व्यक्तित्व पर बुरा प्रभाव पड़ा | इसी कारण उसके जीवन में हीन भावना की ग्रंथि अथवा कुंठा का समावेश हो गया
था जिससे लेखिका आजीवन उभर नहीं सकी थी |
प्रश्न ) लेखिका की साहित्यकारों के
साहित्य को पढ़कर उनसे प्रभावित हुई ?
उत्तर ) लेखिका को कॉलेज की प्राध्यापिका शीला
अग्रवाल ने प्रेमचन्द्र, जैनेन्द्र, अज्ञेय, भगवतीचरण
वर्मा, यशपाल आदि साहित्यकारों की प्रमुख रचनाएँ पढ़ने को दी | लेखिका इन सब का साहित्य पढ़कर इनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी | किन्तु लेखिका जैनेन्द्र की लेखन शैली से विशेष रूप से प्रभावित हुई | उनका सुनीता उपन्यास ने भी
उन्हें बहुत प्रभावित किया | अज्ञेय जी का शेखर: एक जीवनी और
नदी के द्वीप उपन्यास को पढ़कर लेखिका उनकी मनोवैज्ञानिक शैली पर मुग्ध हो गई थी |
जब लेखिका स्वयं साहित्यकार बनी तो इन सब की
शैलियों का प्रभाव उनकी कथात्मक रचनाओं में किसी न किसी रूप में देखा जा सकता है |
प्रश्न) लेखिका के पिता जी की सबसे
बड़ी कमजोरी क्या थी ?
उत्तर ) वह चाहते थे कि सब लोग उसकी प्रशंसा
करें | यश-लिप्सा लेखिका के पिताजी की सबसे बडी कमजोरी
थी | वे विशिष्ट
बनकर रहना चाहते थे | उनका मत था कि समाज में मनुष्य को ऐसे
काम करने चाहिए जिससे उसका नाम हो | उसकी प्रतिष्ठा बढ़े | उसकी अपनी एक पहचान थी |
प्रश्न ) पड़ोस-कल्चर समाप्त होने के
कारण मनुष्य को क्या-क्या हानियाँ उठानी पड़ रही है ?
उत्तर ) पड़ोस
कल्चर से हम अधिक सुरक्षा, अपनेपन का भाव अथवा आत्मीयता का
भाव मिलता है | हम पूरे पड़ोस व मोहल्ले को अपना घर मानते हैं
| बिना हिचक के एक-दूसरे के घर जाते है | किन्तु आज फ्लैट- कल्चर के विकास के कारण पड़ोस-कल्चर समाप्त हो गया | इससे हम अकेलेपन, असुरक्षा,
असहायता की भावना से ग्रस्त हो गए हैं | ‘पड़ोस –कल्चर’ के अभाव का बच्चे के मन पर भी विपरीत
प्रभाव पड़ता हैं |
प्रश्न ) परम्पराओं को लेकर लेखिका के क्या विचार थे ?
उत्तर ) परम्पराओं के विषय में लेखिका ने कहा
कि हमारी परम्पराएँ हमारा भूतकाल बनकर हमारा पीछा कभी नहीं छोड़ती | वे हमारे जीवन में साथ-साथ चलती रहती है | समय के
बदलने पर परंपरा के प्रति विद्रोह की भावना भी व्यक्त होती है | लेखिका अच्छी परंपरा को निभाने के पक्ष में और जीवन के विकास में बाधा
बनने वाली परंपरा को छोड़ने में ही लाभ देखती हैं |
प्रश्न ) डॉक्टर अम्बा लाल ने
लेखिका की किस रूप में सहायता की ?
उत्तर ) डॉक्टर अम्बा लाल लेखिका के पिता के गहरे मित्र थे | उन्होंने
नगर के चौराहे पर लेखिका का भाषण सुना | उससे वे अत्यधिक प्रभावित हुए | ऐसे भाषण
के लिए लेखिका को न केवल शाबाशी दी परंतु उनके पिता के सामने उनकी खूब तारीफ भी की
| इससे पिता का हृदय गर्व से फूल गया | इससे पिता की डॉट खाने से भी बची और पिता
ने कभी उन्हें ऐसे कार्यों में कभी भाग लेने से भी मना नहीं किया |
प्रश्न ) कॉलेज की प्रिन्सिपल मन्नू
से क्यों दुखी थी ?
उस समय स्वाधीनता आंदोलन चालू होने के कारण
मन्नू प्रभात – फेरियाँ निकालती| जुलूसों व हड़तालों में भी भाग लेती | उसके भाषण
बड़े ही जोशीले होते थे | उसकी एक आवाज़ पर कॉलेज की छात्राएँ बाहर आ जाती थी | वह
स्वाधीनता के प्रश्न को लेकर कई बार कॉलेज में हड़तालें भी कर चुकी थी | कॉलेज की
प्रिन्सिपल के लिए कॉलेज चलाना कठिन हो गया था |
लेखिका के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही करने के लिए कॉलेज के प्राचार्य का पत्र आया | इस संबंध में उनके पिताजी को कॉलेज बुलाया गया |
प्रश्न ) ‘एक कहानी यह भी’ नामक पाठ का मुख्य संदेश क्या है ?
उत्तर ) इस कहानी को पढ़कर लड़कियों का देश के विकास के
कार्य में योगदान देने की प्रेरणा मिलती है |
स्वतन्त्रता प्राप्त करने का अधिकार केवल पुरुषों को ही नहीं हैं, बल्कि महिलाओं को भी हैं | हमें अपनी सामर्थ्य के अनुसार देश के विकास में
बढ़-चढ़कर भाग लेना चाहिए | अगर हमारे बड़े इस कार्य में किसी
प्रकार की बाधा बनते है तो हमें सीधी टकराहट की बजाए समझा – बुझाकर अपना काम करते
रहना चाहिए | हमें अच्छी परम्पराओं का पालन करना चाहिए | अतीत की भूलों को ध्यान में रखकर वर्तमान व भविष्य को उज्ज्वल बनाना
चाहिए |
No comments:
Post a Comment