Thursday, May 6, 2021

हम पंछी उन्मुक्त गगन के (सप्रसंग व्याख्या)

 

पाठ  1

हम पंछी उन्मुक्त गगन के

सप्रसंग व्याख्या

हम पंछी उन्मुक्त गगन के

पिंजरबद्ध न गा पाएँगे,

कनक-तीलियों से टकराकर

पुलकित पंख टूट जाएंगे |

हम बहता जल पीने वाले

मर जाएंगे  भूखे-प्यासे ,

कहीं भली है कटुक निबौरी

कनक-कटोरी की मैदा से |

शब्दार्थ –

उन्मुक्त-आज़ाद,  पिजरबद्ध –पिंजरे में कैद , कनक-तीलियाँ- सोने की छड़े,  पुलकित – रोमांचित ,कटुक –कड़वी,

निबौरी –नीम का फल

प्रसंग ---- प्रस्तुत   पंक्तियाँ  बसंत भाग-2 में संकलित हम पंछी उन्मुक्त गगन के कविता से ली गई है |इसके रचयिता शिवमंगल सिंह सुमन है |यहाँ पक्षी मनुष्य  से अपनी अभिलाषा व्यक्त कर रहे है |

सरलार्थ –पक्षी कहते है कि खुले आसमान में उड़ने वाले हम आज़ाद पक्षी पिंजरे में कैद होकर अपना मधुर गान  न गा सकेगे ,भले वह पिंजरा सोने का बना हो | हमारे रोमांचित पंख पिंजरे में लगी इन सोने की छडों से टकराकर  टूट जाएँगे |

हम नदियों,झरनों का बहता जल पीने वाले पक्षी पिंजरे मे कैद होकर भूख –प्यास से मर जाएँगे | हमें सोने की कटोरी में रखी मैदा से बढ़िया कड़वी निबौरी लगती  है | भाव यह है कि पिंजरेमें कैद होकर सोने कि कटोरी में खाने- पीने से अच्छा स्वतंत्र होकर आसमान में उड़ना है |

(2) स्वर्ण-शृंखला के बंधन में

    अपनी गति, उड़ान सब भूले ,

बस सपनों में देख रहे है

तरु की फुनगी पर के झूले |

       ऐसे थे अरमान कि उड़ते

       नीले नभ कि सीमा पाने,

लाल किरण – सी चोंच खोल

चुगते तारक – अनार के दाने |

स्वर्ण-शृंखला- सोने की जंजीरे ;फुनगी-पेड़ के ऊपर का भाग ; अरमान-इच्छा; सीमा – सरहद ; तारक-अनार के दाने

प्रसंग-पूर्ववत

सरलार्थ –इन पंक्तियों में पक्षी बंधनयुक्त जीवन की परेशानियों और अपनी इच्छाओं को व्यक्त करते है |

सरलार्थ  पक्षी कहते है कि सोने की इन जंजीरों में बंधकर हम अपनी स्वाभाविक चाल,उड़ने के ढंग सब भूल गए है |

पेड़ के सबसे ऊपरी भाग पर बैठ कर झूलना , अब तो हमारे लिए बस सपनों की बात बनकर रह गई है |इस बंधन में पड़ने से पहले हमारी भी इच्छा थी कि हम नीले  आसमान के अंत तक उड़े और सूर्य के लाल किरणों के समान अपनी चोंच खोलकर तारों रूपी अनार के दाने चुगते रहे |

(3)  होती सीमाहीन क्षितिज से

      इन पंखों की होड़ा-होड़ी,

     या तो क्षितिज मिलन बन जाता

     या तनती साँसों की डोरी |

     नीड़ न दो, चाहे टहनी का

    आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो ,

    लेकिन पंख दिये है तो

   आकुल उड़ान में विघ्न न डालो |

सीमाहीन-जिसकी कोई सीमा न हो ;  क्षितिज- वह काल्पनिक स्थान जहां धरती और आकाश मिलते दिखाई देते है ;

नीड़-घोंसला ;  होड़ा-होड़ी – प्रतियोगिता ;आकुल- बेचैन ;  विघ्न – बाधा; आश्रय – सहारा ;

प्रसंग-पूर्ववत

सरलार्थ –पक्षी कहते है कि हम मुक्त रहते हुए हम क्षितिज से मुक़ाबला करते अर्थात उड़कर वहाँ पहुंचना चाहते है जहां धरती और आकाश मिलते दिखाई देते है | इस उड़ान में हो सकता है धरती और आकाश का मिलन स्थल हमारे सामने आ जाए या उस स्थान को पाने के लिए अपनी जान देदे |

पक्षी मनुष्यों से कहते है कि चाहे हमे पेड़ों की शाखाओं पर घोंसले भी न बनाने दो या फिर हमारे रहने के स्थान तहस-नहस कर दो ,हमे इसकी परवाह नहीं है ,लेकिन जब ईश्वर ने हमे पंख दिये है तो हमारी उड़ान में किसी तरह की बाधा न डालो |

प्रश्न)  हर तरह की सुख सुविधाएँ पाकर भी पक्षी पिंजरे में बंद क्यों नहीं रहना चाहते ?

उत्तर ) आज़ादी सबको प्रिय होती है | मनुष्य हो या पशु –पक्षी सभी आज़ाद व अपनी इच्छा से कार्य करना चाहते |

          इसी प्रवृति के कारण हर तरह की सुख – सुविधाएँ पाकर भी पक्षी पिंजरे में बंद नहीं रहना चाहते |

प्रश्न ) पक्षी उन्मुक्त रहकर अपनी कौन – कौन सी इच्छाएँ पूरी करना चाहते है ?

उत्तर )  i) पक्षी उड़ते हुए आकाश की सीमा जानना चाहते है |

           Ii) वे तारे रूपी अनार के दाने चुनना चाहते है |

           Iii) वे क्षितिज से प्रतियोगिता करना चाहते है |

प्रश्न ) भाव स्पष्ट कीजिए |

 या तो क्षितिज मिलन बन जाता / या तनती साँसों की डोरी |

उत्तर )  क्षितिज , धरती और आकाश के मिलने का काल्पनिक स्थान होता है | पक्षी इस सीमाहीन क्षितिज से प्रतियोगिता करते हुए उड़ना चाहते है | ऐसा करते हुए  या उनका सपना सच हो जाता है या फिर  उड़ते -उड़ते उनकी मृत्यु हो जाती है |

भाषा की बात

स्वर्ण-शृंखला और लाल किरण-सी में रेखांकित शब्द गुणवाचक विशेषण है | कविता से ढूंढकर इस प्रकार के तीन और उदारहण लिखिए |

i)                     कनक –तीलियाँ

ii)                   कटुक – निबौरी

iii)                  सीमाहीन- क्षितिज

iv)                 आकुल –उड़ान

प्रश्न)  भूखे-प्यासे में द्वंद समास है |इन दोनों शब्दों के बीच लगे चिह्न को सामासिक चिह्न कहते है |इस चिह्न से और का संकेत मिलता है ,जैसे – भूखे-प्यासे=  भूखे और प्यासे |इस प्रकार के चार और उदारण  लिखिए |

सामासिक शब्द

i)                      सुख-दुख =  सुख और दुख                         ii)  माता-पिता = माता और पिता

    Iii) अपना-पराया      = अपना और पराया                    iv) यश-  अपयश =  यश और अपयश

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